Parshuram Avatar

 

विष्णु के छठे अवतार परशुराम, मनुष्य के भीतर की उस अवस्था के प्रतीक हैं जहाँ विवेक अन्याय के विरुद्ध खड़ा होता है।यहाँ उनका जीवन केवल एक योद्धा या क्रोधी ऋषि की कथा तक सीमित नहीं है, वह मनुष्य के भीतर होने वाले आंतरिक परिवर्तन और अधर्म के विनाश का द्योतक भी है।

रूपक के तौर पर परशु बाहरी हथियार नहीं बल्कि विवेक,वैराग्य और आत्म अनुशासन का सूचक है।जिस प्रकार फरसा वृक्ष की अनावश्यक शाखाएँ काटता है, उसी प्रकार साधक का विवेक अहंकार, मोह और भ्रम को काटता है।

उनमें तप और शक्ति का संतुलन है,परशुराम ब्राह्मण भी हैं और योद्धा भी, यह इस बात को दर्शाता है कि ज्ञान और शक्ति का संतुलन आवश्यक है।केवल ज्ञान निष्क्रिय हो सकता है, और केवल शक्ति विनाशकारी, दोनों का समन्वय ही धर्म है।

कथा कहती है, महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र परशुराम ने कठोर तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न कर दिव्य परशु प्राप्त किया। उस समय सहस्रबाहु कार्तवीर्य अर्जुन नामक राजा अपने बल के अहंकार में अधर्म करने लगा था। उसने महर्षि जमदग्नि की कामधेनु का हरण कर लिया और बाद में उसके पुत्रों ने महर्षि की हत्या कर दी। पिता की मृत्यु से क्रोधित होकर परशुराम ने अधर्मी एवं अत्याचारी क्षत्रियों का 21 बार संहार करने की प्रतिज्ञा पूरी की। अंत में उन्होंने विजित पृथ्वी का दान ऋषि कश्यप को देकर तपस्या का मार्ग अपनाया।

Project Details

  • Acrylic on Canvas

  • 30 / 30 inches

  • Year 2026