निकुंज
निकुंज सीरीज़ की शुरुआत में मैंने छांदोग्य उपनिषद में वर्णित हृदय में स्थित जिस गुप्त स्थान की बात की थी, जहाँ बाहरी अंधकार को छोड़कर भीतरी रोशनी तक पहुँचा जा सकता है, उसी दृश्य को इस कृति में उकेरने की कोशिश है, विष्णु के आठवें अवतार और मेरे इष्ट कृष्ण की इस परिकल्पना में।
फूलों, घने वृक्षों से घिरा एक एकांत उपवन, जहाँ तक पहुँचने के लिए मन को एक अदृश्य द्वार से गुज़रना पड़ता है, और वह द्वार हैं राधा। राधा प्रेम और समर्पण की वह धारा हैं जिसमें अहंकार धीरे-धीरे विलीन हो जाता है, और फिर कृष्ण में प्रवेश करना सरल हो जाता है।
कृष्ण मेरे अनुभव में अस्तित्व का संगीत हैं।वे मनुष्य की वह चरम अवस्था हैं, जहाँ भीतर के समस्त विरोधाभासों को स्वीकार कर पूर्ण हुआ जा सकता हैं। क्योंकि कृष्ण जितना रणभूमि में हैं उतना ही रास में भी, वे हँसते हैं, खेलते हैं, प्रेम करते हैं, छल भी करते हैं, और फिर उसी सहजता से ध्यान की निस्तब्धता में उतर जाते हैं।
उनके भीतर जीवन का कोई भाव निषिद्ध नहीं है, क्योंकि वे किसी एक भाव में बँधे नहीं हैं।वे जीवन को उसके समूचे विरोधाभासों के साथ, जैसा है वैसा देखने की दृष्टि देते हैं। कृष्ण को बाहर नही खोजा जा सकता, जो भीतर सबसे शांत, शुद्ध और स्थिर है,जो सब कुछ देखते हुए भी किसी से बँधता नहीं,जो प्रेम करता है और फिर भी स्वतंत्र रहता है,जो जीवन को उसकी सम्पूर्णता में स्वीकार कर सकता है, वही कृष्ण है।
प्रकृति के बाहरी उपवन का एकान्त आंतरिक उपवन में उतरने का माध्यम भर है। श्रीमद्भागवत में इसे प्रेम और चेतना के दिव्य मिलन का स्थान कहा गया है, जो आत्मा और परमात्मा के मिलन का सूक्ष्म रूपक है। यहाँ निकुंज कोई भौतिक स्थान नहीं बल्कि चेतना की एक अवस्था है जहाँ वह कृष्ण के सबसे निकट होती है। वहाँ गोपियाँ साधना की विभिन्न अवस्थाएँ हैं। निकुंज का द्वार हृदय की शांति और पवित्रता से खुलता है, जहाँ कृष्ण पहले से विराजमान हैं।
Project Details
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Acrylic on canvas
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48 / 48 inches
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Year 2026




