Silent Wisdom

2nd Chapter
Insight – 3

अस्तित्व द्वंद्व है, जो भी किया जाए उसके साथ ही उससे विपरीत भी होना शुरू हो जाता है। अगर ज्ञानी कहे कि मैं जो तुम्हें देता हूं, वह सत्य है, तो वह असत्य को जन्म दे रहा। अगर कोई कहे कि वह प्रेम करता है तो साथ ही घृणा को जन्म दे रहा। विपरीत से बचने का कोई उपाय नही। इसलिए लाओत्से कहते हैं, ज्ञानी निष्क्रिय भाव से अपने कार्यों की व्यवस्था और नि:शब्द द्वारा अपने दर्शन का संप्रेषण करते हैं। जो उन्होंने जाना है, उसे मौन से कहते हैं, जो जिया है, उसे मौज़ूदगी से फैलाते हैं। ज्ञानी अगर  प्रेम भी करेगा, तो प्रेम को सक्रियता नही देगा, उसका प्रेम किसी भी क्रिया में प्रकट नही होगा, क्रिया तो दूर वह अपने प्रेम को शब्द भी नही देगा, क्योंकि यह कहने से ही इस शब्द के आस पास घृणा की रेखा खिंच जाती है। कहा हुआ कोई भी शब्द बेशर्त नही हो सकता। उसका प्रेम उसकी घोषणा नही, उसका अस्तित्व होगा। उसका वक्तव्य नही, उसकी आत्मा होगी, वह प्रेम ही होगा। उसका प्रेम एक मौन अभिव्यक्ति होगी, एक मौज़ूदगी होगी, अघोषित, अप्रचारित, निष्क्रिय।

जो भी ज्ञानियों द्वारा बोला गया है, वह केवल जो शब्द को ही समझ सकते हैं, उनको बुलाने का उपाय है, एक बार वे पास आ जाएं, तो उनसे मौन से ही कहा गया। सत्य उन्होंने तब दिया है, जब सुनने वाला मौन में लेने को राज़ी हो गया, जब उसमें ग्राहकता आ गई। मौन हो कर, सिर्फ मौजूद हो कर जो बताया गया, सन्निधि में जिसकी प्रतीति हुई, जो एक से दूसरे में प्रवेश कर गया, एक जीवंत धारा की तरह।

लाओत्से कहते हैं ज्ञानी कर्म नही करते हैं, इसका यह अर्थ नही कि वे व्यवस्था नही करते, अकर्म का मतलब अकर्मण्यता नही है,उनकी मौज़ूदगी व्यवस्था देती है। कर्म विकल्प है, ज्ञान न हो,तो कर्म से व्यवस्था देनी पड़ती है। उनका कहना है आत्म-स्थिति से बड़ा कुछ भी नही। यह बड़ी मौन घटना है। ज्ञानी एक शून्य की तरह विचरण करते हैं, जैसे हैं ही नही। वह चुपचाप जीता है और चुपचाप विदा हो जाता है।

लाओत्से कहते हैं, शांत हो जाएं तो आपके चारों तरफ शांति फैलने लगेगी। सारा आयोजन भीतर की तरफ गति का है, जब कोई भीतर नि:शब्द में उतरता है तो चैतन्य को उपलब्ध होता है।

Therefore the sage manages affairs without action; and conveys his doctrine without words.

Project Details

  • Acrylic on Canvas

  • Round 24" diameter

  • Year 2025