Embracing the one
Chapter 10 Insight 1
इस सूत्र में लाओत्से अद्वैत की बात करते हैं, वे कहते हैं, जब देह और आत्मा को एक जान पाएं तभी अद्वैत की संभावना है। बुद्धि और इंद्रियाँ एक हो जाएं तभी भीतरी द्वैत के द्वंद्व को रोका जा सकता है। जब तक देह और आत्मा के बीच एकात्म न हो, तब तक पदार्थ और चेतना एक नही हो सकते, जगत और ईश्वर एक नही बन सकते।
वे कहते हैं कि जो भी कर रहे हो वही हो जाओ। न जागरूकता, न साक्षी बल्कि एकात्मता, लीनता। जब कोई अपने प्राण वायु को अपनी एकाग्रता से नमनीयता की चरम सीमा तक पहुंचा दे, तो वह शिशुवत कोमल हो जाता है। उसका एक ही रास्ता है, चेतना को बुद्धि से हटा कर नाभि की तरफ लाना है, जबकि हमारी सारी शिक्षा चेतना को बुद्धि के तरफ ले जाने की है। लाओत्से श्वास के रुपांतरण की बात करते हैं, जैसे ही श्वास की गहराई बढ़ेगी हम अपने केंद्र पर आ जाते हैं, और केंद्र पर स्थित होते विराट से एकाकार हो जाता है। जो भी भीतर है उसे ईश्वर की देन समझ कर स्वीकार करना, कुछ भी पाप नही, जैसे ही सर्व स्वीकृति आती है, वैसे ही देह और चेतना की बाकी सारी बाधाएं खत्म हो जाती है।
Project Details
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Acrylic on canvas
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Round 30" diameter
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Year 2025




