Danger of overweening success

Danger of overweening success

Chapter 9 Insight 1, 2

जीवन वर्तुलाकार है, जन्म के जिस बिंदु से यात्रा शुरू होती है, वहीं मृत्यु उपलब्ध होती है। संसार का अर्थ ही है चक्र, यहां कोई भी चीज़ सीधी रेखा पर नहीं चलती, चाहे मौसम हो, चांद तारे हों, पृथ्वी या मनुष्य जीवन, जगत में जितनी गतियां हैं, सभी वर्तुलाकार हैं। वर्तुल का अपना रहस्य है, कि हम जहां से शुरू करते हैं,वहीं वापस पहुंच जाते हैं और आगे बढ़ने के क्रम में, एक बिंदु से पीछे लौटने लगते हैं।

लाओत्से अपने इस सूत्र में कहते हैं, किसी भरे हुए पात्र को ढोने की कोशिश करने के बजाय उसे अधभरा छोड़ देना श्रेयस्कर है। क्योंकि जब भी कोई चीज़ भर जाती है, तो अंत आ जाता है। और सत्य को अगर समझना हो पात्र को अधभरा रखना ही ठीक। लेकिन यह अति कठिन है, क्योंकि जीवन की सभी प्रक्रियाएं भरने के लिए आतुर हैं। लाओत्से आधे पर ही रुकने के लिये कहते हैं क्योकि जीवन के सभी नियमों पर आधे पर रुक जाना संयम है। बार बार एहसास की जाने वाली चीज़ें खत्म हो जाती हैं, तीक्ष्णता पहले अनुभव में तीव्र होती है, जितनी पुनरुक्ति होती है, तीक्ष्णता कम हो जाती है।

वह आगे कहते हैं, जब कोई सफल हो जाए, तो इसके पहले कि अहंकार का जन्म हो, कर्ता को ओझल हो जाना चाहिए, अन्यथा अपनी ही सफलता नर्क बन जाती है।और सफलता के क्षण में ओझल हो जाना ही स्वर्ग का द्वार है। अहंकार जितना सघन उतना ही गहन नर्क, जितना विरल उतना ही स्वर्ग। लाओत्से कहते हैं कि जो सुख को खोजते हैं, वह दुख पाते हैं और दुख खोजने वाले को दुख कभी नही मिलता। जो अहंकार को छोड़ कर जगत को देखता है, उसे सपने और सच्चाई में फर्क नही दिखता, जगत भी स्वप्न सा हो जाता है।

Project Details

  • Acrylic on canvas

  • Round 30" diameter

  • Year 2025