Action without action

Action without action
Chapter 3 Insight 1

 

लाओत्से का यह सूत्र बेहद अद्भुत है। वो कहते हैं चिंता, पीड़ा और संताप इतनी सामान्य अवस्था दिखाई पड़ती है कि निश्चिंत,शांत और सुखी मनुष्य अपवाद महसूस होता है। अज्ञान जीवन की आत्मा मालूम पड़ती है और ज्ञान कोई आकस्मिक या सांयोगिक घटना। तो निश्चित ही इसका कारण मनुष्य के मन की बनावट, उसकी संस्कृति के आधार और सभ्यता के सोचने का ढंग हमारे समाज का ढांचा है। शोध के अनुसार हर व्यक्ति जन्म से प्रतिभाशाली होता है, लेकिन व्यवस्था की वजह से उसकी प्रतिभा कुंठित और नष्ट हो जाती है। एक प्रकार से शुरुआत में ही जड़ों में महत्वकांक्षा का जहर डाला जाता है, ताकि प्रतिस्पर्धा की भावना जगाई जा सके, निरंतर तुलना की जा सके। यानी खुद को जानने से ज्यादा जरूरी है यह सोचना की दूसरे की तुलना में हम कौन हैं। कहीं दूसरे ज्यादा सुख में तो नही। पर जीवन एक वर्तुल है, अक्सर बहुत दौड़ कर आगे पहुंचने वाला अचानक पाता है कि वह बहुत पीछे पहुंच गया।
लाओत्से कहते हैं, योग्यता को पद क्यों बनाये हम, स्वभाव क्यों न माने! कोई गणित में कुशल है तो कोई संगीत में, यह कुशलता उसका स्वभाव है जो उसे प्रकृति से मिलता है।सामाजिक अवधारणाओं में बंधी सोच से किसी को अच्छा किसी को बुरा कह कर हम सीमाएं बांधना शुरू कर देते हैं। बिना इस बात पर गौर किए कि कोई मनुष्य इतना अच्छा नही कि उसमें कोई बुराई न हो, और कोई मनुष्य इतना बुरा नही कि उसमें कोई भी अच्छाई न हो।
अगर ऐसी संभावना हो कि हम सब तरह के स्वभाव को स्वीकार कर पाएं, तो कोई संताप नही, कोई पीड़ा नही। आगे लाओत्से कहते हैं अगर दुर्लभ पदार्थों को महत्व न दिया जाए तो लोग दस्यु वृत्ति से मुक्त रहेंगे। ज़िंदगी चलाने के लिए ईमानदारी काफी है लेकिन ऊंचा उठने के लिए बेईमानी ज़रूरी है। चीज़ें जितनी दुर्लभ होंगी उन्हें पाने के लिए उतना ही संघर्ष होगा, बेईमानी होगी। जो भी चीज कम है वह उतनी ही कीमती, उसकी कीमत देकर हम संघर्ष को जन्माते हैं। लाओत्से कहते हैं, न्यून को महत्व क्यों देना, जो ज्यादा है उस पर ध्यान दो, जो पर्याप्त है उसे महत्व दो। वे कहते हैं अगर कामना से मुक्त चित्त हम निर्मित कर सकें तो हृदय उद्विग्न न रहे। जो हमारे पास है, उसे भोगना स्वस्थ है, पर दिखाना रुग्ण। लोगों का ध्यान आकर्षित न करें तो परम शांति में जी सकते हैं। असल में जो भोग नही पाता वही दिखावा करता है, जो भोग ले उसे दिखावे की जरूरत नही रह जाती।
लाओत्से कहते हैं जो अनुद्विग्न रह जाएं उनकी दूसरी यात्रा शुरू होती है, सत्य की मुक्ति की!

Not to value and employ men of superior ability is the way to keep the people from rivalry among themselves; not to prize articles which are difficult to procure is the way to keep them from becoming thieves; not to show them what is likely to excite their desires is the way to keep their minds from disorder.

Project Details

  • Acrylic on canvas

  • 30'X30 inches

  • Year 2025