Nature of Tao
Nature of Tao
Chapter 4 Insight 1
अस्तित्व में जो भी है वह सब मध्य में है।एक तरफ शून्यता और एक तरफ पूर्णता, और बीच में हमारा होना है। हमारी सारी व्यवस्था इस बीच से पूर्ण की तरफ बढ़ने की है और लाओत्से कहते हैं, इस बीच से शून्य की तरफ जाना है।
ताओ खालीपन है, घड़े की रिक्तता की तरह। अगर सत्य की चाह है, तो रिक्तता अनिवार्य है। क्योंकि जबतक व्यक्ति मिट न जाए तब तक ईश्वर को अनुभव कर पाना संभव नही। हम जीवन भर खुद को भरने की प्रक्रिया में लगे रहते है, वो भी उन चीज़ों से जो हम नही हैं। अनेक तरीके से पूर्ण होने की कोशिश करते रहते है, इस संशय में कि जीवन कहीं अकारथ न चला जाए। पर लाओत्से का कहना है न पूर्णता पाने की चाह रखनी है न अपूर्णता से विचलित होना है, बस खाली हो जाना है। रिक्त हम कभी होते नही, न कभी पूर्ण। हमारा होना अधूरे में है। जितना हम पूर्ण होने की कोशिश करते हैं उतनी ही रिक्तता का बोध होता है। जो हमारे पास नही है, वह हो, यह ज़रूरी नही, वह हमारे हाथ में नही, लेकिन जो हमारे पास है वह छोड़ा जा सकता है। शून्यता तत्क्षण हो सकती है बल्कि रिक्त होने के लिये समय की भी कोई जरूरत नही। खालीपन हमारा स्वभाव है, धर्म है। दृष्टि उस तरफ लग जाये उस दिन ही पूर्ण हो जाना है।शून्य इतना अथाह है मानो सभी पदार्थों का उद्गम हो, जैसे कोई सम्मानित पूर्वज हो।
The Tao is like the emptiness of a vessel; and in our employment of it we must be on our guard against all fullness. How deep and unfathomable it is, as if it were the honored ancestor of all things or like fountain head of all things.
Project Details
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Acrylic on canvas
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18 by 23 inches
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Year 2025