Embracing life without possession

2nd Chapter
Insight – 4

सभी बातें अपने आप घटित होती हैं; ताओ के आधारभूत सिद्धांतों में यह एक आवश्यक बात रही है। ऐसा कुछ भी नही है जिसे घटित करने के लिए हमारी जरूरत होती हो, सभी जरूरी चीज़ें हमारे बिना घटती हैं, नींद आती है,भूख लगती है, जन्म होता है, मृत्यु होती है। लेकिन जो अपने आप घटित होता है, उसे भी हम मान कर चलते हैं कि हम घटित करते हैं। लाओत्से की दृष्टि में सबसे बड़ी भ्रांति मनुष्य की यही है कि वह कर्ता बन जाता है, और यही सबसे बड़ा अज्ञान है। वह कहते हैं, न तो कर्ता बना जा सकता है न त्यागी, वस्तुओं का स्वभाव है घटित होना, बस इतनी प्रतीति हो जाए, ऐसा जान कर भी जो उनसे विमुख न हो, वही है ज्ञानी।

मैं भोजन कर रहा हूं या मैं उपवास कर रहा हूं इन दोनों परिपेक्ष्य में लाओत्से के अनुसार अज्ञानता है क्योंकि दोनों में कर्ता का भाव है, ज्ञानी भूख की प्रक्रिया को साक्षी भाव से देखता है, भूख लगती है, भोजन कर लेता है, नही लगती, नही करता है।

दुख भी तभी दुख मालूम होता है, जब हम अस्वीकार करते हैं, उसका दंश दुख में नही, हमारी अस्वीकृति में है। अगर यह समझ आ जाए कि जो हुआ, वैसा ही होता, वैसा ही होना चाहिए था, वही हो सकता था तो दुख की कोई पीड़ा नही रह जाती। स्वभाव से विपरीत लड़ कर ही हम परेशान हैं। इस जगत में जो भी होता है वह सब स्वाभाविक है। ज्ञानी मुक्त होने की भी चेष्टा नही करते, क्योंकि सब चेष्टाएं बांध लेने वाली सिद्ध होती हैं। जगत अपने नियम से चलता है, कभी कामना उसके अनुकूल पड़ जाती हैं, कभी नही।

ज्ञानी जिस चीज के संपर्क में आता है, उसी को जीवन प्रदान करता है, किंतु अधिकृत नही करता। प्रेम देता है तो वापस प्रेम नही मांगता, लौट आए तो स्वीकार, न आए तो स्वीकार। सब अधिकार वापसी की मांग करते हैं। दरअसल ज्ञानी सुख का रहस्य जानता है, चूंकि वह अधिकार नही करता, इसलिए कोई कर जाता है, तो सुख पाता है, और कोई न करे तो दुख का कोई कारण ही नही, क्योंकि अपेक्षा थी ही नही।

वे प्रतिपल जीवन के सब रूपों से गुज़रते हैं, सभी प्रक्रियाओं से, उम्र से, प्रेम से, घृणा से, धन से, मित्रता-शत्रुता से, पर उन्हें पकड़ने की कोशिश नही करते। जीवन से गुज़र जाते हैं पर मालकियत नही करते। वे कर्तव्य निभाते हैं, जो करने योग्य हो, वह कर जाते हैं, पर श्रेय नही लेते। काम पूरा होते चुपचाप हट जाते हैं क्योंकि ज्ञानी का मानना है कि कर्तव्य में ही पूरा आनंद है, श्रेय वे लेना चाहते हैं जिन्हें करने में आनंद न आया हो। और चूंकि वे श्रेय का दावा नही करते, इसलिए उन्हें श्रेय से वंचित नही किया जा सकता। दावा वे ही करते हैं जो पहले से वंचित हैं या किसी हीन भावना से ग्रस्त, जिन्हें बाहर से पुष्टि चाहिए उनके कुछ होने का, जिन्हें कृत्य में आनंद नही मिला उन्हें श्रेय की आकांक्षा होती है। जो असली दावेदार हैं उनका होना इतना आधारभूत है कि बाहरी मान्यता की जरूरत ही नही।

All things take their rise, but he doesn’t turn away from them; He gives them life, but doesn’t take possession of them; He goes through these processes, but doesn’t take possession of them; it is because he lays no claim to credit that the credit cannot be taken away from him.

Project Details

  • Acrylic on Canvas

  • Round 24" diameter

  • Year 2025